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July 22, 2011

एहसास

मौत के मुहाने पे खड़ा

सोचता हूं


आगाज़ और अंजाम से अविचलित

क्षितिज के परे ताकता हुआ

सोचता हूं


जुगनु जैसी अपनी

जलती बुझती पल पल उखड्ती

सांसों को कुछ और थाम कर सोचता हूं


कि


वोह पल कब आया जब तुम मुझसे दूर हुए

वोह किस घड़ी में हमें तर्क के फैसले मंज़ूर हुए

वोह कब प्यार मगरूर और दिल मजबूर हुए


मुझे एहसास तो हुआ

मगर खबर ना हुई


वोह जब प्यार , प्यार नहीं जीत हार हुआ

वोह जब साथ गुज़ारा वक़्त

सिर्फ घड़ी की सुइयों का सार हुआ

वोह दरिया जिसमें ना डूबा गया , ना पार हुआ


मुझे एहसास तो हुआ

मगर खबर ना हुई


यह एहसास दिल को कचोटता है

अब भी मुझे वहीँ

उसी जगह पर रोक कर रखता है


शायद इस जुनून से हार जाऊंगा

सोचता हूँ इस ज़हर को अब पी ही जाऊंगा

इस सफ़र का यह एक और अजीब मोड़ है

देखो ना यहाँ तो जान देने की भी होड़ है

अंतर सिर्फ इतना है कि


इस बार मुझे

फासले धीरे धीरे बढ़ने का

पूरा एहसास है ,

और पूरी खबर भी है