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June 14, 2014

अबके हम बिछड़े....



आज आसमान को देखें और इबादत करें
शुक्रिया इस मौके का जब फिर हमारी राहें मिलें

आज बदल दे तक़दीर को और एक नया फसाना लिखें


यह पल तोहफा सा लगता है....


क्योंकि अबके हम बिछड़े तो शायद कभी ख्वाबों में मिलें....


आज इस कहानी के पन्नो को समेट लें

दिल में जो खिरचें हैं, उन्हें सी लें


यह अंतिम मौका सा लगता है


क्योंकि अबके हम बिछड़े तो शायद कभी ख्वाबों में मिलें....


आज हाथ बढ़ादे ओह हमराही

तुझे थामें किसी नयी डगर पे चलें


यह मोड़ दोराहा सा लगता है


क्योंकि अबके हम बिछड़े तो शायद कभी ख्वाबों में मिलें....


आज कह दे कुछ ऐसा कि ख़ुदा भी मुस्कुरा दे
जिसे सुनने के इंतज़ार में ना जाने कितने मौसम बदले
पतझड़ के बाद अब हमारे दिलों में भी तो बहारें खिलें


जीवन का यह अंतिम संवाद सा लगता है


क्योंकि अबके हम बिछड़े तो शायद कभी ख्वाबों में मिलें....
सूखे हुए फ़ूल जैसे किताबों में मिलें 











इस कविता कि प्रेरणा अहमद फ़राज़ कि अमर रचना - http://hindilyricspratik.blogspot.com/2012/01/ab-ke-hum-bichhde-to-mehdi-hassan.html

Pic Courtesy- Bakar Adda Page on Facebook (Published May 18)
https://www.facebook.com/bakaradda 

February 10, 2014

साथ साथ

क्या तुम्हें याद है वोह दिन
जब कुछ घबराये हुए
कुछ सकुचाऐ हुए

उस अप्रतिम उत्साह से
एक नयी राह पे...
हम साथ-साथ चले थे

अन्‍जानों में अपने ढूंढे
साथ-साथ
छोटे-छोटे पल, छोटी-छोटी खुशियाँ ज़माने से छीनी
साथ-साथ
मकानों को घर बनाया
साथ-साथ
हर एक दिन को यादगार बनाया
साथ-साथ

और कभी खुद को, कभी दुनिया को आज़माने भी तो...
हम साथ-साथ चले थे

फिर अचानक  लकीरों के खेल में तुम आगे निकल गए
मैं हारता रहा और तुम जीतते रहे
अब मिलन होना सम्भव नहीं
मेरी हस्ती का होकर भी कोई महत्व नहीं

पर जब कभी धूल के गुबार को छोड़
सरपट आगे जाते हुए, पीछे देखो
तो बस इतना याद करना कि

कोई था जो गुम गया जीवन की इन गलियों में
कल की चाह में, कल को भुलाने में
उन सपनों की हकी़कत में
जिन्हें सीने से लगाये एक दिन

हम साथ-साथ चले थे...

बहुत दूर गया हूँ कहीं
आगे-पीछे का अब गुमान नहीं
अब बस मैं हूँ और हारने का एहसास हर कहीं
बहुत कुछ है दांव पर फिर भी
जीत की हर दुआ में तुझे ढूँढता हूँ

इन अंजानीं राहों में
तेरे निशान  ढूँढता हूँ

तुझे याद करने का हर एक बहाना  ढूँढता हूँ
बादलों में तेरा चेहरा
और पवन में तेरी आवाज़  ढूँढता हूँ

बहुत दिन हो गए सोए हुए आज
क्यूंकि आँखों में जो अक्स बसा है तेरा
हर रात पलकों से उसे  ढूँढता हूँ

तू बता

उस आसमान को देख कैसे तेरी याद ना आए
आखिर चांद को पाने और तारों को सरताज चढ़ाने के लिये भी तो

हम साथ-साथ चले थे...